The Buddha quote
आईये कुछ जानकारी शेयर करें।।।
स्थिरवाद ( हीनयान) तथागत बुद्ध के 200वर्ष बाद दो भागों में विभाजित हो गया। एक थेरवाद जो भारत के पूर्व अब भी लंका, वर्मा (म्यांमार) ,मलेसिया,कम्बोडिया, थाइलैंड, लाओस, वियत्तनाम यदि में विराजता है। दूसरा पक्षिम में सर्वास्तिवाद जो तथागत के बाद 1500 वर्ष तक मथुरा, गांधार, मंगोलिया और कश्मीर को केंद्र बना कर रहा।
250 ई पूर्व के लगभग थेरवाद से महाशांघिक सम्प्रदाय बना। आगे कुछ समय बाद महासांघिक से महायान बना। एडके लगभग 400वर्ष बाद महायान कई भागों में टुटा और अनेक सम्प्रदायों में बटा। प्रत्येक सम्प्रदाय निर्वाण प्राप्ति के अनेक साधनों में से किसी एक साधन पर जोर देता था। लगभग सन् 150 ई में नागार्जुन द्वारा माद्द्यमिक सम्प्रदाय की स्थापना हुई। जिसमें शून्यता पर ध्यान लगाने को निर्वाण का मार्ग बताया गया। माद्यमिक विचारको से ही सम्बंधित एक अन्य सम्प्रदाय ने बुद्धों और बोधिसत्वओं और उनकी पूजा उपासना में विस्वास किया। लगभग सन् 400ई में असंग द्वारा योगाचार सम्प्रदाय स्थापित हुआ जिसमे भीतरी चिंतन (introspective meditation) को निर्वाण का साधन माना गया है।
लगभग सन् 500 ई के बाद बुद्ध धम्म में तंत्रयान का विकास हुआ इसमे तंत्र मन्त्र को निर्वाण का साधन माना गया। तंत्रयान का प्रभाव पुरे भारत में विशेष कर बंगाल देखा जा सकता है इसके अतरिक्त नेपाल , तिब्बत, चीन और सिमित मात्रा में जापान, थाइलैंड, मलेसिया, इंडोनेशिया,कम्बोडिया में देखा जा सकता है।
इसके अतरिक्त भारत के बाहर महायान से निकले कुछ नए सम्प्रदाय विकसित हुए जिसमे चीन का (chan meditation), जापान का अमिताभवाद ( amidism) तथा तिब्बत का नेम_मा_पा(nyin_ma_pa) हैं।
भारत में महायान के सहारे तांत्रिक प्रवितियो ने प्रवेश कर बौद्ध धम्म को मंत्रयान (500ई से 700ई तक ) में बदला, फिर मंत्रयान से बज्रयान (सन् 800 ई से सन् 1200ई )में बदला , इसके बाद बज्रयान सन् 1200ई के बाद सहजयान में बदला। यही से बौद्ध धम्म अपने पतन की तरफ जाता है।क्यों की इतने सम्प्रदाय हो गए और उनमे सहयोग भी नहीं रहा। बौद्ध लोग आपस में बुरी तरह से बट गए। इसका फायदा ब्राह्मणों और विदेशी आक्रमणकारियों ने उठाया और धम्म का नास कर दिया।
1200ई से लेकर 1800ई तक भारत में बौद्ध धम्म अपने अन्धकार युग में रहा और कोई नया सम्प्रदाय पैदा नहीं हुआ। फिर भी इस समय लोगों के दिलों धम्म की महान विरासत ज़िंदा रही। वो महान विरासत 1800ई के बाद पुनः अन्धकार युग से निकल निरंतर अपने पुराने हीनयान की तरफ बढ़ रही है। अब अन्धकार युग अपनी समाप्ति पर है।
नागर्जुन और कुमार गुप्त के काल में बहुत अंतर है।
नागर्जुन ने नालन्दा में कभी शिक्षा नहीं ली।
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